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Sunday, September 2, 2012

जन आन्दोलन का राजनीतिकरण 



जे पी के राजनैतिक आन्दोलन ने हिंदुस्तान की राजनीती को बदला ये कहना थोडा मुश्किल है, हाँ सत्ता को जरुर बदला था, पर उसका क्या हस्र हुआ ये सबके सामने है, जिस व्यवस्था और भ्रस्ताचार के विरुद्ध वो आन्दोलन शुरू हुआ था कुछ ही सालो में उसका पोषक बन कर रह गया, जे पी के सैनिको ने नए नए कीर्तिमान स्थापित किये भ्रस्ताचार के, यकीन नहीं होता की लालू, रामविलास जैसे लोग जे पी आन्दोलन से निकले थे, 

इस बार "नायक" का चीफ  मिनिस्टर  या फिर से वही कहानी ! शायद में निराशावाद की तरफ जा रहा हूँ या फिर सच्चाई ......... या  पूरी तरह से गलत !



शीशे की गलियों में, पत्थरो  का जमावड़ा है
कहीं झुरमुट में  इंसान  छिपा बैठा है

सब कुछ गलत है, झूठी कहानी है
फिर पत्थरो  से लड़ना भी बेमानी है

पिछले ज़ख्मो का हिसाब अभी बाकी है
और उस पर ये नयी बीमारी आई है

बगावत की वजह मै नहीं, न ही ये मेरी लड़ाई है
पत्थरो की चोट ,कहीं  अन्दर तक समाई है

तुम न बदलोगे, मै  सब जानता हूँ
फिर भी खुश हूँ, किसी ने आवाज़ तो उठाई  है 

सियासत के  आसमान में आकर 
बेजुबान परिंदों से बहस करने की हिम्मत तो दिखाई है 

शायद इतनी ही मेरी  लड़ाई है