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Friday, November 14, 2014

इस रात की सुबह नहीं।

सन्नाटो की आवाज़ो में, आवाज़ो की ख़ामोशी में
खाक सुबह हो पायेगी, जब नींद नहीं आ पाएगी 

कब तक समझायें, जब खुद ही उलझे रहते हैं 
इस पल उस पल हर पल, खुद ही खोये रहते हैं

न राह पता , ना साथ पता, बस चलते रहते हैं 
जब खुद ही खोये बैठे हैं तो, बस ………

बस रहने देते हैं …… 


P.S. - something irrelevant, irrational, unidentified, unproved and ignorant - even I am confused !

Thursday, January 10, 2013

For Late risers

“The amount of sleep required by the
average person is five minutes more.”
~ Wilson Mizener


The optimal solution is very simple, and many late risers do it without even thinking about it. The solution is to go to bed at your usual time, and set your alarm clock at your usual time. But the difference is that when your alarm clock goes off, instead of getting up, YOU PRESS SNOOZE.
When you press snooze, it gives your inner “late riser” an opportunity to convince your inner “early riser” that staying in bed is a good idea:
It’s nice and warm under the covers. If I get up, it’s going to be cold. That won’t be too pleasant.
I don’t really feel like going office so early when I have to stay late. 
Maybe I’m trying to get myself up too early. I’m still sleepy, aren’t I? Getting up with an alarm is unnatural. Won’t I function better with more sleep?
I don’t have to get up right this minute, do I? Surely I can relax another five minutes or so. The world isn’t going to end if I don’t get up right now.
Two hours later, you won’t even remember your alarm clock going off. You’ll have had a great snuggle,
So if you want to become a late riser (or just exert less control over your sleep patterns), then try this: Go to bed when you’re too sleepy to stay up, and sleep in until a random time every morning.

.......A Profound Late riser


Sunday, September 2, 2012

जन आन्दोलन का राजनीतिकरण 



जे पी के राजनैतिक आन्दोलन ने हिंदुस्तान की राजनीती को बदला ये कहना थोडा मुश्किल है, हाँ सत्ता को जरुर बदला था, पर उसका क्या हस्र हुआ ये सबके सामने है, जिस व्यवस्था और भ्रस्ताचार के विरुद्ध वो आन्दोलन शुरू हुआ था कुछ ही सालो में उसका पोषक बन कर रह गया, जे पी के सैनिको ने नए नए कीर्तिमान स्थापित किये भ्रस्ताचार के, यकीन नहीं होता की लालू, रामविलास जैसे लोग जे पी आन्दोलन से निकले थे, 

इस बार "नायक" का चीफ  मिनिस्टर  या फिर से वही कहानी ! शायद में निराशावाद की तरफ जा रहा हूँ या फिर सच्चाई ......... या  पूरी तरह से गलत !



शीशे की गलियों में, पत्थरो  का जमावड़ा है
कहीं झुरमुट में  इंसान  छिपा बैठा है

सब कुछ गलत है, झूठी कहानी है
फिर पत्थरो  से लड़ना भी बेमानी है

पिछले ज़ख्मो का हिसाब अभी बाकी है
और उस पर ये नयी बीमारी आई है

बगावत की वजह मै नहीं, न ही ये मेरी लड़ाई है
पत्थरो की चोट ,कहीं  अन्दर तक समाई है

तुम न बदलोगे, मै  सब जानता हूँ
फिर भी खुश हूँ, किसी ने आवाज़ तो उठाई  है 

सियासत के  आसमान में आकर 
बेजुबान परिंदों से बहस करने की हिम्मत तो दिखाई है 

शायद इतनी ही मेरी  लड़ाई है

Sunday, May 27, 2012

बात  इतनी सी है



रात  के चार बजे हवा कुछ  तेज़  हो गयी है 
परदे हिल  रहे है अतीत  के उन्ही पन्नो की तरह 

जिन्हें तुमने बनाया था और मैंने भुलाया है 
किसी पुराने खाली सिगरट के डिब्बे की तरह 

कुछ  सात  आठ  साल  बीत  गए  हैं 
जब तुमने बताया था  तारो  के टिमटिमाने की वजह  

हवा तारो की रौशनी को हिला देती है 
ठीक  पंखो  से हिलते परदे की तरह 

विज्ञान  कुछ  और कहता है, शायद गलत  है 
दुनिया ख़तम  होने की खबरों की तरह 


एअरपोर्ट और सड़क  के बीच की खाली जगह याद है 
अब  वहां  नया टर्मिनल  है मासूम  खामोशियो की जगह 

वहीँ मैंने कहा था आवाज़  कुछ  तेज़  हो रही है 
सब बोलते  रहे मुझे सुनने की जगह 

और तभी कहीं से उस  गीत  की आवाज़  भी आई थी 
जिसे सुनकर सब  खत्म  हो गया  बेजान  पठारों की तरह 

बात  इतनी सी है , बात  कुछ  भी नहीं ................






Friday, May 25, 2012

जा चुड़ैल  जा...


All characters appearing in this work are fictitious. Any resemblance to real persons, living or dead, are purely coincidental. 

एक भूतनी थी, भूत की बीवी, भूत इसलिए क्यूंकि हर साल मई में आता था, खुद नहीं लाया जाता था हर न्यूज़ पेपर के 4-6 पेज भर दिए जाते थे , वैसे भूत पहले भूत नहीं था , अच्छा खासा काम करता था लेकिन कुछ लोगो से नहीं सहा गया....... फिर बदला लेने आई भूतनी, किससे बदला ले ये नहीं सोच पा रही थी तो एक नया तरीका निकाला जो भी मिले छोडो नहीं .....

इस भूतनी को तुलसीदास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था और रामचरितमानस में एक चौपाई भी लिखी थी इसके बारे में .

"बहुरि बंदी खल गन सतिभाए , जे बिनु काज दहिनेऊ बाए "
 
पहला बदला लिया दक्षिण भारत के एक विद्वान राजा से जिसकी अपनी सोच थी लेकिन इसने अपने 2-4 भाई बंधू भेजे और बोला कि जा मिटा दे इसका नाम , आज तक किसी को नहीं पता की जिस राजा के साम्राज्य में देश की अर्थव्यवस्था ने इतनी तरक्की की वो जेल के अन्दर बैठकर किताब क्यूँ लिखने लगा

फिर बारी आई एक रंगरूट की जो गलती कर बैठा भूतनी की सत्ता को चुनौती देने की , हारा तो है ही साथ ही एक सड़क दुर्घटना में जान से भी गया लेकिन भूतनी दयावान थी उसके बेटे को उसका पूरा हक दिया वजीर बना के ....

और ये सिलसिला चलता रहा सब डर गए और अब कोई भी ऐसी हिमाकत नहीं करता ......

अगला नंबर था एक सीधे साधे दाढियो वाले साधू की जो अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञाता था, उसे दे दी अपनी गद्दी और बना दिया राजा , पूरा राज्य उसके त्याग की दुहाई दे रहा था, और वो राजा ठीक वैसे ही अपने महल में खुश था जैसे कभी बहादुरशाह दिल्ली का राजा हुआ करता था और अपने महल में बैठकर ग़ालिब की शायरिया सुना करता था, लेकिन उस की ये ख़ुशी भी भूतनी से देखी नहीं गयी और अपने कुछ खाश सिपाहियो को लगा दिया राजा के पीछे और वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, भयानक अकाल ....... राजा बदनाम , भूतनी खुश ........

भूतनी इतने से भी खुश नहीं हुई , हो भी क्यूँ उसे बदला जो लेना था , एक एक कर के जहाँ भी उसकी नजर जाती वो बर्बाद हो जाता ,कभी रूपए पे कभी पेट्रोल पे .........

प्रजा कुछ कर नहीं सकती थी क्यूंकि हर तरफ उसके जासूस फैले हुए थे, जल , वायु ,जमीन हर जगह , ट्विट्टर,फसबूक,ब्लॉग नामक संदेशवाहको पे कड़ी निगरानी लगी, शायद मेरी ये लघु कथा भी उसकी नज़र में आये ............. आ जाये तो ही अच्छा .......

Thursday, March 22, 2012

वह तोडती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर (पुरानी डायरी से )

डॉ निराला की लाइन, हालाँकि मेरा उस कविता से कोई लेना देना नहीं बस याद आ गया .

मुझे ये तो नहीं पता की निराला जी कौन से रस्ते से इलाहाबाद जाते थे, पर ये उत्सुकता जरूर थी की वो लड़की है कौन जो उनके रस्ते को तोड़ देती है तब तो मनरेगा भी नहीं हुआ करती थी जो कुछ न कुछ तो करवाना ही पड़ता है 100  रुपए रोज़ देने के लिए .........

खैर मै मुद्दे पे आ गया हूँ, मनरेगा अच्छी योजना है १०० दिनों का रोज़गार गारटेड़, काम करो या ना करो , गाँधी जी ने तो काम करने को कहा था पता नहीं क्या समस्या थी उन्हें किसी के काम करने या न करने से लेकिन उनके नाम की योजना तो बिना काम किये भी कुछ देती है , 

काम की भी अपनी अलग समस्या कभी ख़तम ही नहीं होती तो कुछ लोग बिना काम के भी दिन भर करते हैं उनके साथ भी मेरी सद्भावना है , एक अवार्ड उनके नाम पे भी देना चाहिए फिल्मफयेर में , 

भटक गया था फिर से मुद्दे पे आता हूँ , पिछले दिनों  मनरेगा को करीब से जानने  का मौका मिला, एक बंधुवर ने बड़े ही अच्छे ढंग से एक घटना सुनाई, काफी बजट है स्कोप अच्छा है , हर महीने पैसा आ जाता है, 60 जॉब कार्ड धारक हैं , इस महीने बजट आया है , 80000 का , 10 दिन काम  कराते हैं तो   60000  देना पड़ेगा बचा 20000, अब समस्या है की 20000 में काम कौन सा कराया जाये , तालाब खुदवाए तो किसी काम का नहीं उलटे कोई गिर गया तो उसका रोना अलग , सड़क तो बन नहीं सकती 20000 में, इटे भी 4-5000  से ज्यादे आ नहीं सकते, आ भी गए तो कौन सा महल बन जायेगा  इसमें एक दीवाल तो बन नहीं सकती , अब तो बस एक ही रास्ता है, किसी पुराने खडंजे की कुछ टूटी इटे बदल देते हैं एक दिन में हो जायेगा, कुछ 100 - 200 इटे ही लगेंगे, 15000 बच जायेंगे, मजदूर भी खुश काम कराने वाला भी खुश , मिल गया रोजगार बन गया infrastructure , 2-3 महीने में फिर से तोड़ देंगे, अगले 3 महीने बाद फिर बनायेंगे.

अक्सर ऐसे सड़के मुझे दिखती भी हैं जो हर साल बरसात में ही बनायीं जाती हैं पर कभी भी पूरी नहीं हो पाती हमेशा टूटी ही दिखती हैं, 

सही कहा था निराला जी कोई तो लड़की है जिसे रास्तो को तोडना अच्छा लगता है, शायद अब बड़ी हो गयी है , इसलिए अब इलाहाबाद ही नहीं देस भर के रास्तो को तोड़ने लगी है, नाम नहीं लूँगा लेकिन मनरेगा से समझ तो आ ही गया होगा आपको..... "मौका मिले तो आप भी दो चार तोडिये इसी में तरक्की है, पुराने टूटेंगे तभी नया आएगा !!!"
 

Tuesday, March 20, 2012

मेरी क्या ग़लती....

कुछ नया नही लगा राजदीप सरदेसाई के साथ ममता बनर्जी के इंटरव्यू को सुनकर, ठीक ही तो कहा जब सोनिया कॉंग्रेस का प्राइम मिनिस्टर तय करती है, तो ममता भी रेलवे मिनिस्टर तय करती है,

कुछ साल पहले आडवाणी जी का एक ब्लॉग पढ़ा था, फिर याद आ गया, जब चन्द्रसेखर की सरकार से भाजपा ने अपना समर्थन वापस लिया था और कॉंग्रेस ने सपोर्ट किया, राजीव गाँधी ने अपना सरकारी आवास(10 जनपथ) लाल कृष्णा आडवाणी को ये कहकर लेने को कहा की जैसे 7 रेसकोर्स सत्ता का केन्द्रा है वैसे ही 10 जनपथ को विपक्ष का केन्द्रा बना देते हैं, काश उस वक़्त आडवाणी मान गये होते तो आज 10 जनपथ जिसके नाम से जनता की राह झलकती है वास्तविक सत्ता का केन्द्रा ना होता, हाँ शायद कोई और नाम होता, लेकिन जनपथ सुनना ज़्यादा खराब लगता है.
 
मूलतः इस तरह का केन्द्र कम्यूनिस्ट शाशन मे दिखता है जहाँ सत्ता के दो केन्द्रा होते हैं, और  वास्तविक सत्ता सही परिप्रेक्षया मे आभाषी सत्ता की चाभी होती है, पर विडंबना ये है की शायद आज हिन्दुस्तान आभाषी और वास्तविक सत्ता के जाल मे है, जहाँ कहने को तो 7 रेसकॉर्स दिशा दिखता है लेंकिन उस रास्ते का नक्शा 10 जनपथ से आता है. 547 सांसद तो सीधे जनता से आते हैं लेकिन उनका मुखिया कहीं किसी की दया से आता है, ना तो वो कोई निर्णय खुद से ले सकता है और ना ही अपने सहयोगी चुन सकता है, कोई ममता चुनती है तो कोई करुणानिधि.... खैर PM तो है उनका क्या जाता है.

हो सकता है कल और बदला हुआ आए, ममता के मंत्री को धोती कुर्ता पहनना अनिवार्य हो और करुणान्निधि के मंत्री को लुँगी, देश का क्या है ये तो तब भी चलता था, अभी भी चल रहा है, आगे भी चलता ही रहेगा, हम जैसे लोग गलिया देते रहेंगे, हमारा भी वक़्त बहल जाता है कुछ खरी खोती सुना के ...... चलता है.......

लेकिन ममता दीदी, आपकी इस बात से तो हम भी आपके साथ है रेलवे मिनिस्टर तो आप का ही होगा, अच्छा होता अगर आप खुद ही बन जाती, CM है तो क्या वैसे भी बंगाल के 20-30 विभाग तो आपके पास ही होंगे एक हिन्दुस्तान का भी रखिए...... चलता रहेगा, ट्रेन नही तो बस सही..... वरना मुलायम जी की साइकल तो है ही...  चलता हूँ आपका अगला इंटरव्यू ज़रूर देखूँगा......