बात इतनी सी है
रात के चार बजे हवा कुछ तेज़ हो गयी है
परदे हिल रहे है अतीत के उन्ही पन्नो की तरह
जिन्हें तुमने बनाया था और मैंने भुलाया है
किसी पुराने खाली सिगरट के डिब्बे की तरह
कुछ सात आठ साल बीत गए हैं
जब तुमने बताया था तारो के टिमटिमाने की वजह
हवा तारो की रौशनी को हिला देती है
ठीक पंखो से हिलते परदे की तरह
विज्ञान कुछ और कहता है, शायद गलत है
दुनिया ख़तम होने की खबरों की तरह
एअरपोर्ट और सड़क के बीच की खाली जगह याद है
अब वहां नया टर्मिनल है मासूम खामोशियो की जगह
वहीँ मैंने कहा था आवाज़ कुछ तेज़ हो रही है
सब बोलते रहे मुझे सुनने की जगह
और तभी कहीं से उस गीत की आवाज़ भी आई थी
जिसे सुनकर सब खत्म हो गया बेजान पठारों की तरह
बात इतनी सी है , बात कुछ भी नहीं ................
choo gayi pandey ji.
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