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Sunday, May 27, 2012

बात  इतनी सी है



रात  के चार बजे हवा कुछ  तेज़  हो गयी है 
परदे हिल  रहे है अतीत  के उन्ही पन्नो की तरह 

जिन्हें तुमने बनाया था और मैंने भुलाया है 
किसी पुराने खाली सिगरट के डिब्बे की तरह 

कुछ  सात  आठ  साल  बीत  गए  हैं 
जब तुमने बताया था  तारो  के टिमटिमाने की वजह  

हवा तारो की रौशनी को हिला देती है 
ठीक  पंखो  से हिलते परदे की तरह 

विज्ञान  कुछ  और कहता है, शायद गलत  है 
दुनिया ख़तम  होने की खबरों की तरह 


एअरपोर्ट और सड़क  के बीच की खाली जगह याद है 
अब  वहां  नया टर्मिनल  है मासूम  खामोशियो की जगह 

वहीँ मैंने कहा था आवाज़  कुछ  तेज़  हो रही है 
सब बोलते  रहे मुझे सुनने की जगह 

और तभी कहीं से उस  गीत  की आवाज़  भी आई थी 
जिसे सुनकर सब  खत्म  हो गया  बेजान  पठारों की तरह 

बात  इतनी सी है , बात  कुछ  भी नहीं ................






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