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Thursday, March 22, 2012

वह तोडती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर (पुरानी डायरी से )

डॉ निराला की लाइन, हालाँकि मेरा उस कविता से कोई लेना देना नहीं बस याद आ गया .

मुझे ये तो नहीं पता की निराला जी कौन से रस्ते से इलाहाबाद जाते थे, पर ये उत्सुकता जरूर थी की वो लड़की है कौन जो उनके रस्ते को तोड़ देती है तब तो मनरेगा भी नहीं हुआ करती थी जो कुछ न कुछ तो करवाना ही पड़ता है 100  रुपए रोज़ देने के लिए .........

खैर मै मुद्दे पे आ गया हूँ, मनरेगा अच्छी योजना है १०० दिनों का रोज़गार गारटेड़, काम करो या ना करो , गाँधी जी ने तो काम करने को कहा था पता नहीं क्या समस्या थी उन्हें किसी के काम करने या न करने से लेकिन उनके नाम की योजना तो बिना काम किये भी कुछ देती है , 

काम की भी अपनी अलग समस्या कभी ख़तम ही नहीं होती तो कुछ लोग बिना काम के भी दिन भर करते हैं उनके साथ भी मेरी सद्भावना है , एक अवार्ड उनके नाम पे भी देना चाहिए फिल्मफयेर में , 

भटक गया था फिर से मुद्दे पे आता हूँ , पिछले दिनों  मनरेगा को करीब से जानने  का मौका मिला, एक बंधुवर ने बड़े ही अच्छे ढंग से एक घटना सुनाई, काफी बजट है स्कोप अच्छा है , हर महीने पैसा आ जाता है, 60 जॉब कार्ड धारक हैं , इस महीने बजट आया है , 80000 का , 10 दिन काम  कराते हैं तो   60000  देना पड़ेगा बचा 20000, अब समस्या है की 20000 में काम कौन सा कराया जाये , तालाब खुदवाए तो किसी काम का नहीं उलटे कोई गिर गया तो उसका रोना अलग , सड़क तो बन नहीं सकती 20000 में, इटे भी 4-5000  से ज्यादे आ नहीं सकते, आ भी गए तो कौन सा महल बन जायेगा  इसमें एक दीवाल तो बन नहीं सकती , अब तो बस एक ही रास्ता है, किसी पुराने खडंजे की कुछ टूटी इटे बदल देते हैं एक दिन में हो जायेगा, कुछ 100 - 200 इटे ही लगेंगे, 15000 बच जायेंगे, मजदूर भी खुश काम कराने वाला भी खुश , मिल गया रोजगार बन गया infrastructure , 2-3 महीने में फिर से तोड़ देंगे, अगले 3 महीने बाद फिर बनायेंगे.

अक्सर ऐसे सड़के मुझे दिखती भी हैं जो हर साल बरसात में ही बनायीं जाती हैं पर कभी भी पूरी नहीं हो पाती हमेशा टूटी ही दिखती हैं, 

सही कहा था निराला जी कोई तो लड़की है जिसे रास्तो को तोडना अच्छा लगता है, शायद अब बड़ी हो गयी है , इसलिए अब इलाहाबाद ही नहीं देस भर के रास्तो को तोड़ने लगी है, नाम नहीं लूँगा लेकिन मनरेगा से समझ तो आ ही गया होगा आपको..... "मौका मिले तो आप भी दो चार तोडिये इसी में तरक्की है, पुराने टूटेंगे तभी नया आएगा !!!"
 

Tuesday, March 20, 2012

मेरी क्या ग़लती....

कुछ नया नही लगा राजदीप सरदेसाई के साथ ममता बनर्जी के इंटरव्यू को सुनकर, ठीक ही तो कहा जब सोनिया कॉंग्रेस का प्राइम मिनिस्टर तय करती है, तो ममता भी रेलवे मिनिस्टर तय करती है,

कुछ साल पहले आडवाणी जी का एक ब्लॉग पढ़ा था, फिर याद आ गया, जब चन्द्रसेखर की सरकार से भाजपा ने अपना समर्थन वापस लिया था और कॉंग्रेस ने सपोर्ट किया, राजीव गाँधी ने अपना सरकारी आवास(10 जनपथ) लाल कृष्णा आडवाणी को ये कहकर लेने को कहा की जैसे 7 रेसकोर्स सत्ता का केन्द्रा है वैसे ही 10 जनपथ को विपक्ष का केन्द्रा बना देते हैं, काश उस वक़्त आडवाणी मान गये होते तो आज 10 जनपथ जिसके नाम से जनता की राह झलकती है वास्तविक सत्ता का केन्द्रा ना होता, हाँ शायद कोई और नाम होता, लेकिन जनपथ सुनना ज़्यादा खराब लगता है.
 
मूलतः इस तरह का केन्द्र कम्यूनिस्ट शाशन मे दिखता है जहाँ सत्ता के दो केन्द्रा होते हैं, और  वास्तविक सत्ता सही परिप्रेक्षया मे आभाषी सत्ता की चाभी होती है, पर विडंबना ये है की शायद आज हिन्दुस्तान आभाषी और वास्तविक सत्ता के जाल मे है, जहाँ कहने को तो 7 रेसकॉर्स दिशा दिखता है लेंकिन उस रास्ते का नक्शा 10 जनपथ से आता है. 547 सांसद तो सीधे जनता से आते हैं लेकिन उनका मुखिया कहीं किसी की दया से आता है, ना तो वो कोई निर्णय खुद से ले सकता है और ना ही अपने सहयोगी चुन सकता है, कोई ममता चुनती है तो कोई करुणानिधि.... खैर PM तो है उनका क्या जाता है.

हो सकता है कल और बदला हुआ आए, ममता के मंत्री को धोती कुर्ता पहनना अनिवार्य हो और करुणान्निधि के मंत्री को लुँगी, देश का क्या है ये तो तब भी चलता था, अभी भी चल रहा है, आगे भी चलता ही रहेगा, हम जैसे लोग गलिया देते रहेंगे, हमारा भी वक़्त बहल जाता है कुछ खरी खोती सुना के ...... चलता है.......

लेकिन ममता दीदी, आपकी इस बात से तो हम भी आपके साथ है रेलवे मिनिस्टर तो आप का ही होगा, अच्छा होता अगर आप खुद ही बन जाती, CM है तो क्या वैसे भी बंगाल के 20-30 विभाग तो आपके पास ही होंगे एक हिन्दुस्तान का भी रखिए...... चलता रहेगा, ट्रेन नही तो बस सही..... वरना मुलायम जी की साइकल तो है ही...  चलता हूँ आपका अगला इंटरव्यू ज़रूर देखूँगा......