डॉ निराला की लाइन, हालाँकि मेरा उस कविता से कोई लेना देना नहीं बस याद आ गया .
मुझे ये तो नहीं पता की निराला जी कौन से रस्ते से इलाहाबाद जाते थे, पर ये उत्सुकता जरूर थी की वो लड़की है कौन जो उनके रस्ते को तोड़ देती है तब तो मनरेगा भी नहीं हुआ करती थी जो कुछ न कुछ तो करवाना ही पड़ता है 100 रुपए रोज़ देने के लिए .........
खैर मै मुद्दे पे आ गया हूँ, मनरेगा अच्छी योजना है १०० दिनों का रोज़गार गारटेड़, काम करो या ना करो , गाँधी जी ने तो काम करने को कहा था पता नहीं क्या समस्या थी उन्हें किसी के काम करने या न करने से लेकिन उनके नाम की योजना तो बिना काम किये भी कुछ देती है ,
काम की भी अपनी अलग समस्या कभी ख़तम ही नहीं होती तो कुछ लोग बिना काम के भी दिन भर करते हैं उनके साथ भी मेरी सद्भावना है , एक अवार्ड उनके नाम पे भी देना चाहिए फिल्मफयेर में ,

भटक गया था फिर से मुद्दे पे आता हूँ , पिछले दिनों मनरेगा को करीब से जानने का मौका मिला, एक बंधुवर ने बड़े ही अच्छे ढंग से एक घटना सुनाई, काफी बजट है स्कोप अच्छा है , हर महीने पैसा आ जाता है, 60 जॉब कार्ड धारक हैं , इस महीने बजट आया है , 80000 का , 10 दिन काम कराते हैं तो 60000 देना पड़ेगा बचा 20000, अब समस्या है की 20000 में काम कौन सा कराया जाये , तालाब खुदवाए तो किसी काम का नहीं उलटे कोई गिर गया तो उसका रोना अलग , सड़क तो बन नहीं सकती 20000 में, इटे भी 4-5000 से ज्यादे आ नहीं सकते, आ भी गए तो कौन सा महल बन जायेगा इसमें एक दीवाल तो बन नहीं सकती , अब तो बस एक ही रास्ता है, किसी पुराने खडंजे की कुछ टूटी इटे बदल देते हैं एक दिन में हो जायेगा, कुछ 100 - 200 इटे ही लगेंगे, 15000 बच जायेंगे, मजदूर भी खुश काम कराने वाला भी खुश , मिल गया रोजगार बन गया infrastructure , 2-3 महीने में फिर से तोड़ देंगे, अगले 3 महीने बाद फिर बनायेंगे.
अक्सर ऐसे सड़के मुझे दिखती भी हैं जो हर साल बरसात में ही बनायीं जाती हैं पर कभी भी पूरी नहीं हो पाती हमेशा टूटी ही दिखती हैं,
सही कहा था निराला जी कोई तो लड़की है जिसे रास्तो को तोडना अच्छा लगता है, शायद अब बड़ी हो गयी है , इसलिए अब इलाहाबाद ही नहीं देस भर के रास्तो को तोड़ने लगी है, नाम नहीं लूँगा लेकिन मनरेगा से समझ तो आ ही गया होगा आपको..... "मौका मिले तो आप भी दो चार तोडिये इसी में तरक्की है, पुराने टूटेंगे तभी नया आएगा !!!"