Pages

Sunday, May 27, 2012

बात  इतनी सी है



रात  के चार बजे हवा कुछ  तेज़  हो गयी है 
परदे हिल  रहे है अतीत  के उन्ही पन्नो की तरह 

जिन्हें तुमने बनाया था और मैंने भुलाया है 
किसी पुराने खाली सिगरट के डिब्बे की तरह 

कुछ  सात  आठ  साल  बीत  गए  हैं 
जब तुमने बताया था  तारो  के टिमटिमाने की वजह  

हवा तारो की रौशनी को हिला देती है 
ठीक  पंखो  से हिलते परदे की तरह 

विज्ञान  कुछ  और कहता है, शायद गलत  है 
दुनिया ख़तम  होने की खबरों की तरह 


एअरपोर्ट और सड़क  के बीच की खाली जगह याद है 
अब  वहां  नया टर्मिनल  है मासूम  खामोशियो की जगह 

वहीँ मैंने कहा था आवाज़  कुछ  तेज़  हो रही है 
सब बोलते  रहे मुझे सुनने की जगह 

और तभी कहीं से उस  गीत  की आवाज़  भी आई थी 
जिसे सुनकर सब  खत्म  हो गया  बेजान  पठारों की तरह 

बात  इतनी सी है , बात  कुछ  भी नहीं ................






Friday, May 25, 2012

जा चुड़ैल  जा...


All characters appearing in this work are fictitious. Any resemblance to real persons, living or dead, are purely coincidental. 

एक भूतनी थी, भूत की बीवी, भूत इसलिए क्यूंकि हर साल मई में आता था, खुद नहीं लाया जाता था हर न्यूज़ पेपर के 4-6 पेज भर दिए जाते थे , वैसे भूत पहले भूत नहीं था , अच्छा खासा काम करता था लेकिन कुछ लोगो से नहीं सहा गया....... फिर बदला लेने आई भूतनी, किससे बदला ले ये नहीं सोच पा रही थी तो एक नया तरीका निकाला जो भी मिले छोडो नहीं .....

इस भूतनी को तुलसीदास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था और रामचरितमानस में एक चौपाई भी लिखी थी इसके बारे में .

"बहुरि बंदी खल गन सतिभाए , जे बिनु काज दहिनेऊ बाए "
 
पहला बदला लिया दक्षिण भारत के एक विद्वान राजा से जिसकी अपनी सोच थी लेकिन इसने अपने 2-4 भाई बंधू भेजे और बोला कि जा मिटा दे इसका नाम , आज तक किसी को नहीं पता की जिस राजा के साम्राज्य में देश की अर्थव्यवस्था ने इतनी तरक्की की वो जेल के अन्दर बैठकर किताब क्यूँ लिखने लगा

फिर बारी आई एक रंगरूट की जो गलती कर बैठा भूतनी की सत्ता को चुनौती देने की , हारा तो है ही साथ ही एक सड़क दुर्घटना में जान से भी गया लेकिन भूतनी दयावान थी उसके बेटे को उसका पूरा हक दिया वजीर बना के ....

और ये सिलसिला चलता रहा सब डर गए और अब कोई भी ऐसी हिमाकत नहीं करता ......

अगला नंबर था एक सीधे साधे दाढियो वाले साधू की जो अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञाता था, उसे दे दी अपनी गद्दी और बना दिया राजा , पूरा राज्य उसके त्याग की दुहाई दे रहा था, और वो राजा ठीक वैसे ही अपने महल में खुश था जैसे कभी बहादुरशाह दिल्ली का राजा हुआ करता था और अपने महल में बैठकर ग़ालिब की शायरिया सुना करता था, लेकिन उस की ये ख़ुशी भी भूतनी से देखी नहीं गयी और अपने कुछ खाश सिपाहियो को लगा दिया राजा के पीछे और वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, भयानक अकाल ....... राजा बदनाम , भूतनी खुश ........

भूतनी इतने से भी खुश नहीं हुई , हो भी क्यूँ उसे बदला जो लेना था , एक एक कर के जहाँ भी उसकी नजर जाती वो बर्बाद हो जाता ,कभी रूपए पे कभी पेट्रोल पे .........

प्रजा कुछ कर नहीं सकती थी क्यूंकि हर तरफ उसके जासूस फैले हुए थे, जल , वायु ,जमीन हर जगह , ट्विट्टर,फसबूक,ब्लॉग नामक संदेशवाहको पे कड़ी निगरानी लगी, शायद मेरी ये लघु कथा भी उसकी नज़र में आये ............. आ जाये तो ही अच्छा .......