जा चुड़ैल जा...
All characters appearing in this work are fictitious. Any resemblance to real persons, living or dead, are purely coincidental
एक भूतनी थी, भूत की बीवी, भूत इसलिए क्यूंकि हर साल मई में आता था, खुद नहीं लाया जाता था हर न्यूज़ पेपर के 4-6 पेज भर दिए जाते थे , वैसे भूत पहले भूत नहीं था , अच्छा खासा काम करता था लेकिन कुछ लोगो से नहीं सहा गया....... फिर बदला लेने आई भूतनी, किससे बदला ले ये नहीं सोच पा रही थी तो एक नया तरीका निकाला जो भी मिले छोडो नहीं .....
इस भूतनी को तुलसीदास जी ने बहुत पहले ही पहचान लिया था और रामचरितमानस में एक चौपाई भी लिखी थी इसके बारे में .
"बहुरि बंदी खल गन सतिभाए , जे बिनु काज दहिनेऊ बाए "
"बहुरि बंदी खल गन सतिभाए , जे बिनु काज दहिनेऊ बाए "
पहला बदला लिया दक्षिण भारत के एक विद्वान राजा से जिसकी अपनी सोच थी लेकिन इसने अपने 2-4 भाई बंधू भेजे और बोला कि जा मिटा दे इसका नाम , आज तक किसी को नहीं पता की जिस राजा के साम्राज्य में देश की अर्थव्यवस्था ने इतनी तरक्की की वो जेल के अन्दर बैठकर किताब क्यूँ लिखने लगा
फिर बारी आई एक रंगरूट की जो गलती कर बैठा भूतनी की सत्ता को चुनौती देने की , हारा तो है ही साथ ही एक सड़क दुर्घटना में जान से भी गया लेकिन भूतनी दयावान थी उसके बेटे को उसका पूरा हक दिया वजीर बना के ....
और ये सिलसिला चलता रहा सब डर गए और अब कोई भी ऐसी हिमाकत नहीं करता ......
अगला नंबर था एक सीधे साधे दाढियो वाले साधू की जो अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञाता था, उसे दे दी अपनी गद्दी और बना दिया राजा , पूरा राज्य उसके त्याग की दुहाई दे रहा था, और वो राजा ठीक वैसे ही अपने महल में खुश था जैसे कभी बहादुरशाह दिल्ली का राजा हुआ करता था और अपने महल में बैठकर ग़ालिब की शायरिया सुना करता था, लेकिन उस की ये ख़ुशी भी भूतनी से देखी नहीं गयी और अपने कुछ खाश सिपाहियो को लगा दिया राजा के पीछे और वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, भयानक अकाल ....... राजा बदनाम , भूतनी खुश ........
भूतनी इतने से भी खुश नहीं हुई , हो भी क्यूँ उसे बदला जो लेना था , एक एक कर के जहाँ भी उसकी नजर जाती वो बर्बाद हो जाता ,कभी रूपए पे कभी पेट्रोल पे .........
प्रजा कुछ कर नहीं सकती थी क्यूंकि हर तरफ उसके जासूस फैले हुए थे, जल , वायु ,जमीन हर जगह , ट्विट्टर,फसबूक,ब्लॉग नामक संदेशवाहको पे कड़ी निगरानी लगी, शायद मेरी ये लघु कथा भी उसकी नज़र में आये ............. आ जाये तो ही अच्छा .......
फिर बारी आई एक रंगरूट की जो गलती कर बैठा भूतनी की सत्ता को चुनौती देने की , हारा तो है ही साथ ही एक सड़क दुर्घटना में जान से भी गया लेकिन भूतनी दयावान थी उसके बेटे को उसका पूरा हक दिया वजीर बना के ....
और ये सिलसिला चलता रहा सब डर गए और अब कोई भी ऐसी हिमाकत नहीं करता ......
अगला नंबर था एक सीधे साधे दाढियो वाले साधू की जो अर्थशास्त्र का अच्छा ज्ञाता था, उसे दे दी अपनी गद्दी और बना दिया राजा , पूरा राज्य उसके त्याग की दुहाई दे रहा था, और वो राजा ठीक वैसे ही अपने महल में खुश था जैसे कभी बहादुरशाह दिल्ली का राजा हुआ करता था और अपने महल में बैठकर ग़ालिब की शायरिया सुना करता था, लेकिन उस की ये ख़ुशी भी भूतनी से देखी नहीं गयी और अपने कुछ खाश सिपाहियो को लगा दिया राजा के पीछे और वही हुआ जिसकी उम्मीद थी, भयानक अकाल ....... राजा बदनाम , भूतनी खुश ........
भूतनी इतने से भी खुश नहीं हुई , हो भी क्यूँ उसे बदला जो लेना था , एक एक कर के जहाँ भी उसकी नजर जाती वो बर्बाद हो जाता ,कभी रूपए पे कभी पेट्रोल पे .........
प्रजा कुछ कर नहीं सकती थी क्यूंकि हर तरफ उसके जासूस फैले हुए थे, जल , वायु ,जमीन हर जगह , ट्विट्टर,फसबूक,ब्लॉग नामक संदेशवाहको पे कड़ी निगरानी लगी, शायद मेरी ये लघु कथा भी उसकी नज़र में आये ............. आ जाये तो ही अच्छा .......
छा गए पांडे तुम तो.
ReplyDeletepandey ji , metaphor hai yeh. i know aap kis bhootani ke bare main baat kar rahe hai. likha acha hai, kam se kam kabil sibal pakad nai payega.
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